भावार्थ : जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।
यह एक संस्कृत श्लोक है जो भगवद गीता में दिया गया है। इस श्लोक में एक ऐसा व्यक्ति वर्णित है जो भगवान के प्रति अत्यंत समर्पित है और समस्त विकारों से मुक्त है।
उसका मन न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है। यह शब्द ‘हर्ष’ और ‘शोक’ को अपनाने का अर्थ है जो अत्यंत सुख और दुख को दर्शाते हैं। यह व्यक्ति भी किसी भी वस्तु की कामना नहीं करता है। उसका मन शुद्ध होता है, उसे शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करने में समर्थ होना चाहिए।

इस श्लोक का सारांश है कि भगवान को समर्पित होने के लिए आवश्यकता होती है कि आप अपने मन को समस्त विकारों से मुक्त रखें और समस्त कर्मों का त्याग करें। इस प्रकार आप भगवान के प्रति अत्यंत समर्पित होंगे और वह आपको प्रिय होगा।