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सभी धर्मों को त्याग कर… सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

सभी धर्मों को त्याग कर… सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

यह श्लोक भगवद गीता के अठारहवां अध्याय स्लोक 66 में है और इसमें भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि सभी धर्मों को छोड़ दें और केवल उन्हें आश्रय दें। यह श्लोक असल में अनन्य भक्ति के सिद्धान्त को दर्शाता है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन मेरी शरण में आता है तो मैं उसे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।

यह श्लोक धर्मों के महत्व को बताता है जहां भगवान ने अपने भक्त को सभी धर्मों को छोड़कर केवल उन्हें ही आश्रय देने की सलाह दी है। इसका अर्थ यह है कि धर्म जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन जब हम ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं तो धर्म का अर्थ कुछ और हो जाता है।

इस श्लोक का व्याख्यान विभिन्न ढंगों से किया गया है, लेकिन इसका मुख्य अर्थ यह है कि अगर हम भगवान के प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं तो हम सभी पापों से मुक्त हो जाते


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